हम बस अपने घर ही तो आना चाहते थे।

कभी अपनों को तरसते थे,
भाग दौड़ की इस ज़िन्दगी को कोसते थे।
वक़्त की चाहत थी,
न अपनों के साथ समय की इजाज़त थी,
बस काम की ही तो इबादत थी।
कभी घर के खाने को याद करते थे,
तो कभी मां की डाट न भूल पाते थे,
हम बस अपने घर ही तो आना चाहते थे।
आज अपनों के साथ है,
और वक़्त की तो क्या बात है।
पर हम अब और क्या कहे,
हम तो इससे भी तंग है,
जो नहीं है, उसी की क्यों मांग है।

Comments

Popular posts from this blog

जींस।

Bihar Board: Intermediate exam registration form date extended, eleventh students can apply immediately from this link

अनचाहे यौन उत्पीड़न से मानसिक परेशानी का खतरा