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क्या सच में वक़्त के साथ प्यार खत्म हो जाता है?

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अब तो मुझे हमारी आखिरी मुलाकात भी याद नहीं है। यादे जैसे धुंधली पर रही है। सुना था कि वक़्त के साथ हर दुःख ख़त्म हो जाता है पर क्या प्यार भी वक़्त के साथ खत्म हो जाता है?                        (Image Source- Google) आज भी याद है तुम्हारा यू प्यार से देखना और मेरे देखते ही नज़रे घुमा लेना। मेरे बिना बोले ही मेरी हर बात समझ लेते थे। उन लम्हों को फिर से जीना हैं पर जैसे वक़्त को ये मंज़ूर नहीं। हम साथ रहना चाहते है पर साथ नहीं। क्या सच में वक़्त के साथ प्यार खत्म हो जाता है? 

हम बस अपने घर ही तो आना चाहते थे।

कभी अपनों को तरसते थे, भाग दौड़ की इस ज़िन्दगी को कोसते थे। वक़्त की चाहत थी, न अपनों के साथ समय की इजाज़त थी, बस काम की ही तो इबादत थी। कभी घर के खाने को याद करते थे, तो कभी मां की डाट न भूल पाते थे, हम बस अपने घर ही तो आना चाहते थे। आज अपनों के साथ है, और वक़्त की तो क्या बात है। पर हम अब और क्या कहे, हम तो इससे भी तंग है, जो नहीं है, उसी की क्यों मांग है।

ये न हिन्दू देख रहा है, न मुसलमां देख रहा है।

ये मत पूछो कि ये, किसे मार रहा है। ये न हिन्दू देख रहा है, न मुसलमां देख रहा है, ये तो बस, इन्सा देख रहा है। अब तो ये भी सुना कि, बाघ भी इससे नहीं बचा है। ये न जाति देख रहा है, न कोई धरम देख रहा है। बीमारी है ये बस, बीमार कर रहा है। ये मत पूछो कि ये, किसे मार रहा है। ये न हिन्दू देख रहा है, न मुसलमां देख रहा है। बीमारी है ये बस, बीमार कर रहा है। (साक्षी शिवा)